नाम-गोत्र से रुद्राभिषेक
प्रत्येक सहभागी के नाम एवं गोत्र से नील मणि सहित विशेष रुद्राभिषेक किया जाएगा।
श्रावण मास की पावन कालाष्टमी तिथि पर भगवान महाकालेश्वर एवं भगवान काल भैरव की विशेष कृपा प्राप्ति हेतु कालाष्टमी रुद्राभिषेक एवं शनि नामावली पूजन का दिव्य आयोजन किया जा रहा है। इस विशेष अनुष्ठान में भगवान शिव के रुद्रावतार काल भैरव की आराधना के साथ वैदिक विधि से रुद्राभिषेक सम्पन्न किया जाएगा। यह पूजा विशेष रूप से शनि, राहु एवं केतु के अशुभ प्रभावों की शांति, भय एवं बाधाओं से रक्षा तथा जीवन में सुख, शांति एवं सकारात्मक ऊर्जा की मंगलकामना के लिए समर्पित है।
गौसेवा का शास्त्रीय महत्व
सनातन धर्म में गौ को केवल पशु नहीं, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्रदायिनी माना गया है। वेद, पुराण और स्मृतियों में गौसेवा को महापुण्यकारी बताया गया है।
शास्त्रवचन
गावो विश्वस्य मातरः॥
(ऋग्वैदिक परंपरा में प्रसिद्ध उक्ति)
भावार्थ: गौ सम्पूर्ण विश्व की माता है।
मातरः सर्वभूतानां गावः सर्वसुखप्रदाः।
वृद्धिमाकाङ्क्षता नित्यं गावः कार्याः प्रदक्षिणाः॥
भावार्थ: गौ सभी प्राणियों की माता एवं सुख प्रदान करने वाली है। जो उन्नति चाहता है, उसे नित्य गौ का सम्मान करना चाहिए।
महाभारत में गौमहिमा
गावः प्रतिष्ठा भूतानां गावः स्वस्त्ययनं महत्।
गावः पवित्रं परमं गावो मङ्गलमुत्तमम्॥
भावार्थ: गौ समस्त प्राणियों की आधारशिला है। गौ परम पवित्र और सर्वोत्तम मंगल का स्रोत है।
स्कन्दपुराण
यत्र गावः पूज्यन्ते तत्र तिष्ठन्ति देवताः।
भावार्थ: जहाँ गौ का सम्मान और सेवा होती है, वहाँ देवताओं का निवास होता है।
गौसेवा के आध्यात्मिक लाभ
पापक्षय
गोसेवा गोदानं च सर्वपापप्रणाशनम्।
गौसेवा को अनेक पुराणों में पापों के क्षय का साधन कहा गया है।
ग्रहशांति
वैदिक ज्योतिष परंपरा में गौसेवा को विशेषतः सूर्य, चन्द्र, गुरु, राहु एवं केतु जनित कष्टों की शांति हेतु लाभकारी माना गया है।
पितृकृपा
अमावस्या, श्राद्ध एवं पितृकर्म में गौसेवा का विशेष महत्व माना गया है।
धन एवं समृद्धि
गावः लक्ष्म्याः सदनं स्मृतम्।
भावार्थ: गौ को लक्ष्मी का निवास स्थान माना गया है।
आरोग्य एवं कल्याण
गौमाता से प्राप्त पंचगव्य एवं गौ-आधारित जीवनशैली को आयुर्वेद में स्वास्थ्यवर्धक बताया गया है।
आपके महाअनुष्ठान हेतु विशेष घोषणा
"कालाष्टमी रुद्राभिषेक, शनि नामावली सहित में प्राप्त प्रत्येक दानराशि का एक भाग गौसेवा एवं गोसंरक्षण हेतु समर्पित किया जाएगा।"
"इस प्रकार यजमान को एक साथ शिवपूजन, तीर्थपूजन एवं गौसेवा—तीनों महापुण्यों का लाभ प्राप्त होगा।"
प्रचार सामग्री हेतु संक्षिप्त पंक्तियाँ
"कालाष्टमी रुद्राभिषेक, शनि नामावली सहित में आपका अंशदान केवल एक धार्मिक सहभागिता नहीं, बल्कि शिवभक्ति, गौसंरक्षण एवं सनातन संस्कृति के संरक्षण का पावन संकल्प है।"
या यह श्लोक भी अंत में दिया जा सकता है—
गावः सुरभयो नित्यं गावो गुग्गुलुगन्धिकाः।
गावः प्रतिष्ठा भूतानां गावः स्वस्त्ययनं महत्॥
भावार्थ: गौएँ सदा कल्याणकारी हैं, समस्त प्राणियों की आधार हैं और महान मंगल प्रदान करती हैं।
प्रत्येक सहभागी के नाम एवं गोत्र से नील मणि सहित विशेष रुद्राभिषेक किया जाएगा।
शनि अष्टोत्तरी नामावली का सस्वर पाठ कर विशेष शांति प्रार्थना की जाएगी।
पूजन सम्पन्न होने पर महाआरती, प्रसाद एवं दिव्य आशीर्वाद प्रदान किया जाएगा।
हर पूजन एक निश्चित पूजा विकल्प है जिसकी अपनी कीमत है। भाग लेते समय एक चुनें।
8:00 am - 5:00 pm
नाम एवं गोत्र से रुद्राभिषेक, शनि नामावली पाठ एवं महाआरती सहित विशेष संकल्प।
विस्तृत वैदिक विधि से विशेष रुद्राभिषेक एवं शनि शांति अनुष्ठान।
यह श्रावण मास की पावन कालाष्टमी तिथि पर भगवान महाकालेश्वर एवं भगवान काल भैरव की कृपा प्राप्ति हेतु आयोजित विशेष रुद्राभिषेक एवं शनि नामावली पूजन है।
मान्यता है कि कालाष्टमी के दिन भगवान काल भैरव एवं भगवान शिव की आराधना करने से शनि, राहु एवं केतु के अशुभ प्रभावों की शांति तथा जीवन की बाधाओं से राहत की मंगलकामना की जाती है।
इस पूजा में नाम एवं गोत्र से व्यक्तिगत संकल्प, नील मणि सहित रुद्राभिषेक, शनि अष्टोत्तरी नामावली का सस्वर पाठ, वैदिक पूजन, महाआरती एवं प्रसाद वितरण शामिल है।
हाँ। जो श्रद्धालु व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो सकते, वे ऑनलाइन दर्शन एवं संकल्प सेवा का लाभ ले सकते हैं।
कोई भी श्रद्धालु अपने एवं अपने परिवार के कल्याण, शनि शांति, राहु-केतु दोष शांति तथा जीवन की बाधाओं से राहत की मंगलकामना हेतु इस पूजा में सहभागी बन सकता है।
पार्थिवेश्वर पूजन का शास्त्रीय आधार महापूजन का विशेष महत्व १. शिवपुराण शिवपुराण में भगवान शिव स्वयं पार्थिव लिङ्ग पूजन की महिमा बताते हैं— पार्थिवं लिङ्गमादाय यः पूजयति शङ्करम्। तस्य सर्वाणि कार्याणि सिद्ध्यन्ति नात्र संशयः ॥ भावार्थ : जो भक्त पार्थिव (मिट्टी के) शिवलिङ्ग का निर्माण कर भगवान शंकर का पूजन करता है, उसके सभी कार्य सिद्ध होते हैं। २. लिङ्गपुराण गन्धपुष्पादिभिर्भक्त्या पार्थिवं यः प्रपूजयेत्। अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ भावार्थ : जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से पार्थिव लिङ्ग का पूजन करता है, वह सहस्र अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त करता है। ३. स्कन्दपुराण न पार्थिवसमं लिङ्गं न पार्थिवसमं तपः । न पार्थिवसमं पुण्यं त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ भावार्थ : तीनों लोकों में पार्थिव लिङ्ग के समान न कोई तप है, न कोई पुण्य है और न ही कोई अन्य श्रेष्ठ लिङ्ग। ४. शिवधर्म एवं आगम परम्परा मृत्तिकालिङ्गनिर्माणं शिवपूजां करोति यः । जन्मकोटिकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥ भावार्थ : जो व्यक्ति मिट्टी का शिवलिङ्ग बनाकर शिवपूजन करता है, उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। महापूजन का विशेष महत्व महाकाल की पावन नगरी अवन्तिका में , सप्तसागर तीर्थों में प्रतिष्ठित श्री विष्णु सागर के दिव्य तट पर , द्विलक्षपञ्चाशत्सहस्र ( २ , ५ १ , ००० ) पार्थिवेश्वर महापूजन का आयोजन । जहाँ प्रत्येक पार्थिव शिवलिङ्ग भगवान महाकाल को समर्पित होगा , वहीं रुद्रपाठ , अभिषेक एवं वैदिक मंत्रों की दिव्य ध्वनि सम्पूर्ण वातावरण को शिवमय करेगी । शास्त्रों के अनुसार पार्थिवेश्वर पूजन सर्वकामना - सिद्धि , ग्रहशान्ति , पितृकृपा , आरोग्य , ऐश्वर्य तथा शिवसायुज्य प्रदान करने वाला माना गया है । अवन्तिका क्षेत्र एवं विष्णु सागर तीर्थ में सम्पन्न यह महा अनुष्ठान अनन्त पुण्य एवं कल्याण का साधन है ।
श्रावण मास में भगवान शिव की विशेष उपासना श्रावण मास भगवान शिव का सर्वाधिक प्रिय माना गया है। इस माह में जप, तप, रुद्रपाठ, अभिषेक एवं शिवपूजन का फल अनेक गुना बढ़ जाता है। समुद्र मंथन के समय भगवान शिव द्वारा हलाहल विषपान के पश्चात देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया, इसी कारण श्रावण में जलाभिषेक एवं रुद्राभिषेक का विशेष महत्व माना गया है। श्रावण मास भगवान शिव को समर्पित वह पवित्र काल है जिसमें एक बूंद जल भी शिवलिंग पर चढ़ जाए तो अक्षय पुण्य की प्राप्ति मानी गई है। इस विशेष अनुष्ठान श्रृंखला के माध्यम से हम प्रत्येक श्रद्धालु तक महादेव की कृपा पहुँचाने का संकल्प लेते हैं।
नागपंचमी सनातन धर्म का एक अत्यंत पावन पर्व है। यह पर्व नागदेवताओं, भगवान शिव तथा सृष्टि की सूक्ष्म दिव्य ऊर्जाओं के प्रति श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों में नाग केवल भौतिक सर्प नहीं बल्कि संरक्षण, कर्मबंधन, आध्यात्मिक जागरण एवं दिव्य शक्तियों के प्रतीक माने गए हैं। वैदिक ज्योतिष में जब जन्मकुण्डली के सभी ग्रह राहु और केतु के मध्य स्थित हो जाते हैं, तब उस स्थिति को सामान्यतः कालसर्प योग कहा जाता है। परम्परागत मान्यता के अनुसार यह योग जीवन में संघर्ष, विलम्ब, मानसिक अशान्ति अथवा बार-बार आने वाली बाधाओं से सम्बन्धित माना जाता है। नागपंचमी के पावन अवसर पर भगवान शिव, नागदेवता तथा राहु-केतु की विशेष पूजा के साथ यह कालसर्प दोष शांति महाअनुष्ठान सम्पन्न किया जाता है।