पूजाएँ
महाकाल नगरी उज्जैन में २,५१,००० पार्थिव शिवलिंग महापूजनम्
पार्थिवेश्वर पूजन का शास्त्रीय आधार महापूजन का विशेष महत्व १. शिवपुराण शिवपुराण में भगवान शिव स्वयं पार्थिव लिङ्ग पूजन की महिमा बताते हैं— पार्थिवं लिङ्गमादाय यः पूजयति शङ्करम्। तस्य सर्वाणि कार्याणि सिद्ध्यन्ति नात्र संशयः ॥ भावार्थ : जो भक्त पार्थिव (मिट्टी के) शिवलिङ्ग का निर्माण कर भगवान शंकर का पूजन करता है, उसके सभी कार्य सिद्ध होते हैं। २. लिङ्गपुराण गन्धपुष्पादिभिर्भक्त्या पार्थिवं यः प्रपूजयेत्। अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ भावार्थ : जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से पार्थिव लिङ्ग का पूजन करता है, वह सहस्र अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त करता है। ३. स्कन्दपुराण न पार्थिवसमं लिङ्गं न पार्थिवसमं तपः । न पार्थिवसमं पुण्यं त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ भावार्थ : तीनों लोकों में पार्थिव लिङ्ग के समान न कोई तप है, न कोई पुण्य है और न ही कोई अन्य श्रेष्ठ लिङ्ग। ४. शिवधर्म एवं आगम परम्परा मृत्तिकालिङ्गनिर्माणं शिवपूजां करोति यः । जन्मकोटिकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥ भावार्थ : जो व्यक्ति मिट्टी का शिवलिङ्ग बनाकर शिवपूजन करता है, उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। महापूजन का विशेष महत्व महाकाल की पावन नगरी अवन्तिका में , सप्तसागर तीर्थों में प्रतिष्ठित श्री विष्णु सागर के दिव्य तट पर , द्विलक्षपञ्चाशत्सहस्र ( २ , ५ १ , ००० ) पार्थिवेश्वर महापूजन का आयोजन । जहाँ प्रत्येक पार्थिव शिवलिङ्ग भगवान महाकाल को समर्पित होगा , वहीं रुद्रपाठ , अभिषेक एवं वैदिक मंत्रों की दिव्य ध्वनि सम्पूर्ण वातावरण को शिवमय करेगी । शास्त्रों के अनुसार पार्थिवेश्वर पूजन सर्वकामना - सिद्धि , ग्रहशान्ति , पितृकृपा , आरोग्य , ऐश्वर्य तथा शिवसायुज्य प्रदान करने वाला माना गया है । अवन्तिका क्षेत्र एवं विष्णु सागर तीर्थ में सम्पन्न यह महा अनुष्ठान अनन्त पुण्य एवं कल्याण का साधन है ।
श्रावण मास में भगवान शिव की विशेष उपासना महाकाल नगरी उज्जैन में
श्रावण मास में भगवान शिव की विशेष उपासना श्रावण मास भगवान शिव का सर्वाधिक प्रिय माना गया है। इस माह में जप, तप, रुद्रपाठ, अभिषेक एवं शिवपूजन का फल अनेक गुना बढ़ जाता है। समुद्र मंथन के समय भगवान शिव द्वारा हलाहल विषपान के पश्चात देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया, इसी कारण श्रावण में जलाभिषेक एवं रुद्राभिषेक का विशेष महत्व माना गया है। श्रावण मास भगवान शिव को समर्पित वह पवित्र काल है जिसमें एक बूंद जल भी शिवलिंग पर चढ़ जाए तो अक्षय पुण्य की प्राप्ति मानी गई है। इस विशेष अनुष्ठान श्रृंखला के माध्यम से हम प्रत्येक श्रद्धालु तक महादेव की कृपा पहुँचाने का संकल्प लेते हैं।
मंगल नाथ उज्जैन में विशेष मंगल शांति भात पूजा महानुष्ठान
उज्जयिनी भारत की सप्तपुरियों में से एक तथा भगवान महाकालेश्वर की पावन नगरी है। प्राचीन ग्रंथों में इसे अवन्तिका कहा गया है। यह नगरी नवग्रहों में सेनापति माने जाने वाले भगवान मंगल (भौम) की जन्मस्थली मानी जाती है। इसी कारण उज्जैन स्थित श्री मंगलनाथ मंदिर को मंगल ग्रह की शांति एवं अनुग्रह प्राप्ति का सर्वोच्च स्थान माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है— अवन्तिकायां मङ्गलो जातः सर्वमङ्गलकारकः। तत्र पूजितमात्रेण दोषान्हन्ति न संशयः॥ अर्थात अवन्तिका (उज्जयिनी) में उत्पन्न हुए मंगलदेव की श्रद्धापूर्वक आराधना से ग्रहजन्य कष्टों का शमन होता है। उज्जैन की वैदिक परम्परा में भात पूजन को मंगल शांति पूजन अथवा भौम शांति अनुष्ठान के रूप में जाना जाता है। इसमें वैदिक विधि से भगवान मंगल, नवग्रह, कुलदेवता तथा इष्टदेव का आवाहन कर विशेष पूजा, जप, हवन एवं अर्पण किया जाता है। भारतीय संस्कृति में भात (अन्न) समृद्धि, पोषण, स्थिरता और जीवन ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। इसलिए भात अर्पण के माध्यम से भगवान मंगल से जीवन में स्थैर्य, स्वास्थ्य, सम्पन्नता, साहस और पारिवारिक मंगल की प्रार्थना की जाती है।
नागपंचमी विशेष श्री कालसर्प दोष शांति महाअनुष्ठान
नागपंचमी सनातन धर्म का एक अत्यंत पावन पर्व है। यह पर्व नागदेवताओं, भगवान शिव तथा सृष्टि की सूक्ष्म दिव्य ऊर्जाओं के प्रति श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों में नाग केवल भौतिक सर्प नहीं बल्कि संरक्षण, कर्मबंधन, आध्यात्मिक जागरण एवं दिव्य शक्तियों के प्रतीक माने गए हैं। वैदिक ज्योतिष में जब जन्मकुण्डली के सभी ग्रह राहु और केतु के मध्य स्थित हो जाते हैं, तब उस स्थिति को सामान्यतः कालसर्प योग कहा जाता है। परम्परागत मान्यता के अनुसार यह योग जीवन में संघर्ष, विलम्ब, मानसिक अशान्ति अथवा बार-बार आने वाली बाधाओं से सम्बन्धित माना जाता है। नागपंचमी के पावन अवसर पर भगवान शिव, नागदेवता तथा राहु-केतु की विशेष पूजा के साथ यह कालसर्प दोष शांति महाअनुष्ठान सम्पन्न किया जाता है।
कालाष्टमी रुद्राभिषेक, शनि नामावली सहित
श्रावण मास की पावन कालाष्टमी तिथि पर भगवान महाकालेश्वर एवं भगवान काल भैरव की विशेष कृपा प्राप्ति हेतु कालाष्टमी रुद्राभिषेक एवं शनि नामावली पूजन का दिव्य आयोजन किया जा रहा है। इस विशेष अनुष्ठान में भगवान शिव के रुद्रावतार काल भैरव की आराधना के साथ वैदिक विधि से रुद्राभिषेक सम्पन्न किया जाएगा। यह पूजा विशेष रूप से शनि, राहु एवं केतु के अशुभ प्रभावों की शांति, भय एवं बाधाओं से रक्षा तथा जीवन में सुख, शांति एवं सकारात्मक ऊर्जा की मंगलकामना के लिए समर्पित है।